खिलाफते राशीदा सानी (II nd) पर 100 सवाल (89-90)


➡ सवाल नं. (89): क्या खिलाफत अंतर्राष्ट्रीय क़वानीन को मान्यता देगी? 

  • अंतराष्ट्रीय क़वानीन साम्राज्यवादी हुकुमतों का एक हथियार है, जिसे साम्राज्यवादी अपने मफाद और हुकुमत के विस्तार के लिए क़मज़ोर देशों पर लागू करते है।
  • साम्राज्यवादी देश जैसे कि अमरिका जो अपने मफाद के लिए देशों से जंगे लड़ता है, और जिसके खिलाफ चाहता है, आर्थिक जब्र व ज़ुल्म करता है। और जब उसकी मर्ज़ी होती है संयुक्त राष्ट्र संघ कि राय कि परवाह किए बग़ैर अंतराष्ट्रीय क़वानीन की धज्जीया उडा़ देता हैं ।
  • इससे पता चला कि यह सिर्फ कमजोर देशों के लिए एक खिलोना है, ताक़तवर देशों ने कभी भी इन अंतराष्ट्रीय क़वानीन की कोई परवाह नही की। हक़ीक़त यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ एक ऐसी संस्था हैं जो ताक़तवर देशों के द्वारा नियंत्रित की जाती है और यह संस्था इन साम्राज्यवादीयों के मफादात के खिलाफ किसी क़िस्म का प्रभावशाली फैसला लेने मे असक्षम हैं ।
  • खिलाफत एक नई क़िस्म की सियासत कि शुरुआत करेगी जो ना सिर्फ घरेलू पैमाने पर बल्कि आलमी पैमाने पर जहाँ वोह दुनिया में पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के नज़रियात को चैलेन्ज करेगी। खिलाफत की फोरेन पॉलिसी में जंगी परिस्थिति बहुत कम बनेगी।, क्योंकि कई सारे लक्ष्य राजनैतिक जंग और डिपलोमेटिक वॉर (रणनितिक जंग) से ही हल हो जायेगें।
  • खिलाफत सिर्फ और सिर्फ अल्लाह सुबाहनहू व तआला और शरीअत के क़वानीन से बंधी हुई होती है, इस सूरत में किसी भी अदालत का फैसला या कई सारे देशों का गठजोड़ अगर खिलाफत को मजबूर करता है या मजबूर करने कोशिश करेगा तो खिलाफत उसे स्वीकार नही करेगी। हांलाकि खिलाफत दुसरे देशों से मामलात चलाने के लिए कुछ काबिले क़बूल नियम रखती है।
  • अल्लाह के नबी (صلى الله عليه وسلم) से यह साबित है कि आप (صلى الله عليه وسلم) ने कुछ इस्लामी क़वानीन अंतराष्ट्रीय स्तर पर लागू किए। क्योंकि कुछ ऐसे क़वानीन भी होते है जो काबिले क़बूल होते है, जिनमें कोई शरई टकराव नही होता है।



खिलाफते राशिदा सानी (II nd) पर 100 सवाल


➡ सवाल नं. (90): खिलाफत की फिलीस्तीन के मामलें में क्या पॉलिसी होगी?


मुस्लिम हुक्मरानों ने मश्रिके वुस्ता (मिडिल ईस्ट/मध्य पूर्व) को एक के बाद दूसरे ने फिलिस्तीन की उम्मत को कुफ्फरों के हाथ बेचा है और हमेशा इजरायल की पक्ष लिया है।
यह वही लोग है जिन्होंने इज़रायल के वजूद को क़ानूनी हैसियत दी और उम्मत को कमज़ोर किया है। ☑ चूँकि यह सरज़मीन उम्मते मुस्लिमा की हुआ करती थी, जिसे विदेशी ताक़तों ने जब्र के ज़रिए हासिल किया और आज भी इसे मान्यता देने और सही क़रार देने के लिए कोशिश चलती रहती है तो इसलिए इसके अलावा और कोई हल नही बचता कि इस क़ब्ज़ो को, जो उन्होंने फिलीस्तीन के इलाको पर किया, उसे दोबारा पलटा जाए। यही वो चीज़ है जिसे इस्लाम फर्ज़ क़रार देता है, जिसे इस्लामी इतिहास में हमारे बुर्जुगो सलाउद्दीन अय्यूबी (रह0) ने किया था।

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